10th hindi

10th hindi book notes – स्वदेशी

10th hindi book notes

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10th hindi book notes – स्वदेशी

class – 10

subject – hindi

lesson 4 – स्वदेशी

स्वदेशी
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-बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमधन’
कविता का सारांश:-
‘प्रेमधन सर्वस्व’ से संकलित प्रस्तुत दोहा में प्रेमधन ने देश-दशा का उल्लेख करते हुए नव जागरण का शंख फंका है। वे कहते हैं-
देश के सभी लोगों में विदेशी रौति, स्वभाव और लगाव दिखाई पड़ रहा है। भारतीयता तो अब भारत में दिखाई ही नहीं पड़ती। आज भारत के लोगों को देखकर पहचान करना कठिन है कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान और कौन ईसाई ।
विदेशी भाषा पढ़कर लोगों की बुद्धि विदेशी हो गई है। अब इन लोगों को विदेशी चाल-चलन माने लगी है। लोग विदेशी ठाट-बाट से रहने लगे हैं। अपना देश विदेश बन गया
है। कहीं भी नाममात्र को भारतीयता दृष्टिगोचर नहीं होती।
अब तो हिन्दू लोग हिन्दी नहीं बोलते। वे अंग्रेजी का ही प्रयोग करते हैं, अंग्रेजी में ही भाषण देते हैं। वे अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करते, अंग्रेजी कपड़े पहनते हैं। उनकी रीति और नीति भी अंग्रेजी जैसी है। पर और सारी चीजें देशी नहीं हैं। ये देश के विपरीत हैं। सम्प्रति, हिन्दुस्तानी नाम से भी ये शर्मिदा होते और सकुचाने लगते हैं। इन्हें हर भारतीय
वस्तु घृणा है। इनके उदाहरण हैं देश के नगर। सर्वत्र अंग्रेजी चाल-चलन है। बाजार में देखिए,अंग्रेजी माल भरा है।
देखिए, जो लोग अपनी ढीली-ढाली धोती नहीं संभाल सकते, वे लोग देश को क्या
संभालेंगे? यह सोचा ही कल्पनालोक में विचरण करना है। चारों ओर चाकरी को प्रवृत्ति बढ़
रही है। ये लोग झूठी प्रशंसा, घुशामद कर हुफली. अर्थात् ढिंढोर भी बन गए हैं।

सरलार्थ
―――――
भारतेन्दु युग के प्रतिनिधि कवि प्रेमधन हिन्दी साहित्य के प्रखर कवि है । ये काव्य और जीवन दोनों क्षेत्रों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अपना आदर्श मानते थे। प्रेमधनजी निबंधकार, नाटककार कवि एवं समीक्षक थे। इनकी काव्य रचनाएँ अधिकांशतः ब्रजभाषा और अवधी में हैं किन्तु युग के प्रभाव से खड़ी बोली का व्यवहार और गोन्मुखता साफ झलकती है।
प्रस्तुत कविता में कषि ने राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को अपना सहचर बनाकर साम्राज्यवाद एवं सामंतवाद का विरोध किया है। लोगों की सोच उनकी कुठित मानसिकता का परिणाम है आज विदेशी वस्तुओं में लोगों की आसक्ति बढ़ गई है। भारतीयता का कहीं नामोनिशान नहीं दिखता है। हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि सभी पाश्चात्य संस्कृति को धड़ल्ले से अपना रहे हैं । पठन पाठन, खान-पान, पहनावा आदि में लोग विदेशी चीजों की तरफ आकर्षित हो गये हैं। आज सर्वत्र अंग्रेजी का बोलबाला है । पराधीन भारत की दुर्दशा बढ़ती जा रही है। हिन्दुस्तान
का नाम लेने से कतराते हैं। बाजारों में अंग्रेजी वस्तुओं की भरमार है। अंग्रेजों से नौकरियाँ पाने के लिए लोग ठाकुरसुहाती करने में लगे हैं। वस्तुतः यहाँ कवि समस्त भारतवासियों में नवजागरण का पाठ पढ़ाना चाहता है । पराधीनता की बड़ी को तोड़कर कवि एक अभिनव भारत की स्थापना करना चाहता है

पद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न
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1. सबै विदेसी वस्तु नर, गति रति रीत लखात।
भारतीयता कछु न अब, भारत मदरसात ।।
मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान।
मुसल्मान, हिन्दू किधौं, के हैं ये क्रिस्तान ।।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन है ?
उत्तर-बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं?
उत्तर-स्वदेशी ।

(iii) कौन-सी चीज भारत में आज दिखाई नहीं पड़ती?
उत्तर-आजकल भारत में भारतीयता कहीं दिखाई नहीं पड़ती।

(iv) भारत में किसकी पहचान कठिन है?
उत्तर-इन दिनों भारत में यह पहचानना मुश्किल है कि कौन हिन्दू हैं, कौन मुसलमान और कौन ईसाई।

(v) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किस बात पर चिंता प्रकट की है? भावार्थ सहित स्पष्ट करें।
उत्तर-कवि जब भारत की स्थिति पर नजर डालता है तो दुखी हो जाता है। वह कहता है कि आज तो यहाँ विदेशी लोग, विदेशी रीति, विदेशी चाल-ढाल ही दिखाई देती है। भारतीयता नाम की चीज कहीं दिखाई नहीं पड़ती। और तो और यह पहचानना भी मुश्किल है कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान और कौन ईसाई। यह स्थिति अत्यन्त चिंताजनक है।

2. पढ़ि विद्या परदेसी की, बुद्धि विदेसी पाय।
चाल-चलन परदेसी की, गई इन्हें अति भाय ।।
ठटे बिदेसी ठाट सब बन्यो देस बिदेस।
सपनेहूँ जिनमें न कहूँ, भारतीयता लेस ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर-बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-स्वदेशी।

(iii) भारत के लोगों की बुद्धि कैसी हो गई है और क्यों?
उत्तर-भारत के लोगों की बुद्धि अर्थात् सोच भी विदेशी हो गयी है। इसका कारण है विदेशी शिक्षा अर्थात् अंग्रेजी शिक्षा पद्धति में शिक्षित होना।

(iv) अब भारत के लोगों ने क्या अपना लिया है?
उत्तर-भारत के लोगों ने अब विदेशी चाल-चलन, खान-पान, रहन-सहन तथा माल अपना की बनी गाड़ी पर चढ़ते, इंगलैंड का बना कपड़ा पहनते, उनके ही रंग-ढंग अपनाते हैं, घर-द्वार लिया है। विदेशी ढंग से रहना भी अब भारत के लोगों को अच्छा लगने लगा है।

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें ।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘स्वदेशी’ काव्य पाठ से उद्धत की किया गया है। इन पंक्तियों के द्वारा कवि कहना चाहता है कि भारतीय लोग विदेशी विद्या को पढ़ने की ओर उन्मुख है, विदेशी विद्या के अध्ययन के कारण इनकी बुद्धि-विचार भी विदेशी-सा हो गया है।
दूसरे देश की चाल-चलन, वेश-भूषा, रीति-नीति, इन्हें बहुत अच्छी लग रही है। इनकी मति मारी गयी है।
कवि ने विदेशी ज्ञान प्राप्त करनेवाले भारतीय लोगों की मानसिकता का सही चित्रण किया है। कवि कहता कि अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति इनका मोह नहीं रहा। ये अब विदेशी रहन-सहन में ढल गए हैं, यह खेद का विषय है। आधुनिकता की ओर उन्मुख भारतीय शिक्षित वर्ग की अदूरदर्शिता के प्रति कवि ने घोर निंदा प्रकट करते हुए अपनी मनोव्यथा को व्यक्त किया।
इन पंक्तियों द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि अपने ही देश में सारे ठाट-बाट ने विदेशी रूप धारण कर लिया है। सभी लोग अंग्रेजियत से प्रभावित रहन-सहन, सोच-विचार में ढल गए हैं। सबकी मानसिकता विकृत हो गयी है। किसी को भी अपनी निजता, इतिहास, अस्तित्व के प्रति गर्व नहीं, सभी-लोभी और महत्त्वाकांक्षी हो गये हैं।

3. बोलि सकत हिन्दी नहीं, अब मिलि हिंदू लोग।
अंगरेजी भारजन करत, अंगरेजी उपभोग ।
अँगरेजी बाहन, बसन, वेष रीति औ नीति।
अँगरेजी रुचि, गृह, सकल, वस्तु देस विपरीत ॥

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
उत्तर-बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?
उत्तर-स्वदेशी।

(iii) भाषा के संबंध में आज भारत की क्या स्थिति है?
उत्तर-आज भारत में हिन्दू लोग भी हिन्दी नहीं बोलते। सभी अंग्रेजी बोलते हैं, अंग्रेजी में ही भाषण देते हैं।

(iv) ‘सकल, वस्तु देस विपरीत कवि ने क्यों कहा है?
उत्तर-कवि पाता है कि देश में लोग अंग्रेजी बोलते, अंग्रेजी ढंग का भोजन करते, इंगलैंड वस्तु देस विपरीत’ कहता है ।

(v) गद्यांश का भावार्थ लिखिए
उत्तर-कवि कहता है कि देश में सब-कुछ उलटा चल रहा है। अब हिन्दुस्तानी हिन्दी नहीं बोलते, भाषण भी अंग्रेजी में ही देते हैं। खान-पान भी अंग्रेजों जैसा है। सवारी, कपड़ा,
सोच-विकार, घर-द्वार भी रोजी इंगवाला है अर्थात आज जो भी हो रहा है. भारतीयता के विपरीत हो रहा है।

4.हिन्दुस्तानी नाम सुनि, अब ये सकुचि लजात।
भारतीच सब वस्तु ही, सों ये हाय धिनात ।।
देस नगर बानक बनो, सब अंगरेजी चाला
हाटन मैं देखहु भरा, बसे अंगरेजी माल ।

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर-बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धत हैं?
उत्तर-स्वदेशी

(iii) हिन्दुस्तानी क्यों लज्जित होते और किनसे घृणा करते हैं?
उत्तर-हिन्दुस्तानी अब हिन्दुस्तानी नाम सुनकर लजित होते हैं और हिन्दुस्तान की बनी चीजों से घृणा करते हैं।

(iv) आज देश की ठाट-बाट की क्या दशा है?
देती है। देश के सभी हाट-बाजार आग विदेशी पाल से भरे पड़े हैं।
उत्तर-आज भारत की दशा अजीब है। गाँव-नगर सब जगह अंग्रेजी चाल-चलन दिखाई देती है। देश के सभी हाट बाजार आज विदेशी माल से भरे पड़े हैं।

(v) पद्यांश का भावार्थ लिखें।
उत्तर-कवि प्रेमधन कहते हैं कि आज विचित्र स्थिति है। हिन्दुस्तानी लोग हिन्दुस्तानी नाम पसन्द नहीं करते, उसे सुनकर लज्जित होने लगते हैं। वस्तुतः इन्हें अब भारतीय वस्तुओं से घृष्णा होने लगी है, शहर-गाँव सब जगह अंग्रेजी चाल-चलना हाट-बाजार भी विदेशी माल से भरे है।

5. जिनसों सम्हल सकत नहिं तनकी, योती ढीली-बाली।
देस प्रबंध करिहिंगे वे यह, कैसी खाम खवाली ।।
दास-वृत्ति की चाह चहूँ दिसि चारह बरन बढ़ाली।
करत खुशामद झूठ प्रशंसा मानहुँ बने डफाली ॥

(1) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर-बदरीनारायण चौधरी “प्रेमघन’ ।

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं?
उत्तर-स्वदेशी।

(iii) कवि के विचार से आज खाम खयाली क्या है?
उत्तर-कवि के विचार से जिन लोगों से अपनी धोती नहीं संभलती वे किस प्रकार देश का प्रबंध करेंगे, देश का शासन सुचारू रूप से चलाएंगे, यह खाम-खयाली यानि कोरी कल्पना है।

(iv) आज चारों वर्गों में कौन-सी वृत्ति हावी है?
उत्तर-आज चारों वर्गों के लोगों में नौकरी करने की प्रवृत्ति या दास वृत्ति हावी है।

(v) पद्यांश का सारांश लिखें।
उत्तर-“स्वदेशी” कविता के प्रस्तुत तिम दोहे में कवि भारत के लोगों द्वारा शासन तंत्र संभालने और शासकों की झूठ-मूठ प्रशंसा करनेवालों का जिक्र करते हुए कहता है कि यह सोच कपोल कल्पना के अलावा कुछ नहीं है कि जो अपनी धोती नहीं संभाल सकते, वे देश के शासन का सुचारू रूप से संचालन करने में सक्षम होंगे। दूसरे दोहे में कवि कहता है कि लोगों की प्रवृत्ति बदल गई है। चारों वर्षों के लोग केवल नौकरी के चक्कर में हैं और इसके लिए शासक वर्ग की सूची प्रशंसा खुशामद में लगे हैं शासकों के झूठे यशोगान करते हुए डफली बजा रहे हैं।

बोध और अभ्यास
―――――――――
*कविता के साथ:-

प्रश्न 1.कविता के शीर्थक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर:- वस्तुतः किसी भी गद्य दिया पद्य का शीर्षक हुआ दूरी है जिसके चारों ओर कहानी या भाव घूमते रहते हैं ।रचनाकार के रख देते समय उसके कथानक, कथावस्तु,
कथ्य को ध्यान में रखकर ही शीषर्क का चयन करता है ।प्रस्तुत कविता का शीर्षक ‘स्वदेशी’ अपने आप में उपयुक्त है। पराधीन भारत की दुर्दशा और लोगों की सोच को ध्यान में रखकर इस शीर्षक को रखा गया है। अंग्रेजी वस्तुओं को फैशन मानकर लोग नए समाज की परिकल्पना करते हैं।रहन-सहन,खान-पान आदि में सभी पाश्चात्य देशों का ही अनुकरण कर रहे हैं। आज लोग विदेशी वस्तुओं को तुच्छ मानते हैं। हिंदू,मुस्लिम, ईसाई आदि सभी विदेशी वस्तु पर भरोसा करते हैं। उन्हें अपनी संस्कृति विरोधाभासी लगती है । बाजार में विदेशी बस में ही नजर आती है। भारतीय कहने-कहलाने पर अपने आप को एक ही दृष्टि से देखते हैं।सर्वत्र पाश्चात्य चीजों का ही बोलबाला है जो इन दृष्टांतो से स्पष्ट होता है। प्रस्तुत कविता का शीर्षक सार्थक और समीचीन है।

 

प्रश्न 2. कवि को भारत में भारतीयता क्यों नहीं दिखाई पड़ती?
उत्तर-वस्तुतः कषि पराधीन भारत की स्थिति को यथातथ्य के रूप में प्रकट किया है। भारतीय अपनी पहचान देने में घबराते हैं। आज वस्तु, नर नारी, रीत, आदि सभी विदेशी ही दृष्टिगत होते हैं। लोग अपनी सभ्यता-संस्कृति को निम्न दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि कवि को भारत में भारतीयता नहीं दिखाई देती है।

प्रश्न 3. कवि समाज के किस वर्ग की आलोचना करता
और क्यों?
उत्तर-कवि समाज के प्रतिनिधि वर्ग की आलोचना करता है। प्रतिनिधित्व करनेवाले लोग स्वार्थ की पूर्ति करने में अपनी सभ्यता संस्कृति आदि को भी गिरवी रखने में हिचकते नहीं हैं। व्यवस्था के नाम पर लोगों को उगते हैं। उनकी धोती डोली हो गई है। आज विदेशी वस्तुओं का बोल-बाला है। यह वर्ग विदेशी खान-पान, पहनावा को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 4, कवि नगर, बाजार और अर्थव्यवस्था पर क्या टिप्पणी करता है?
उत्तर-कवि ने भारतीय बाजारों में होनेवाले परिवर्तनों से दुःखी है। आज नगर, बाजार सभी जगहों में विदेशी वस्तुओं की भरमार है। समाज के प्रतिनिधि अपना जीवन ढोने में लगे हैं। विदेशी वस्तुओं से अर्थव्यवस्था में काफी परिवर्तन आ गया है। आदमी अपनी पहचान बताने से कतराता है। नौकरी की तलाश में उकुरसुहाती सर्वत्र दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 5. नेताओं के बारे में कवि की क्या राय है?
उत्तर-देश के जनप्रतिनिधि अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे हुए हैं। उन्हें अपनी धोती संभालने में ही समय व्यतीत हो जाता है। वे देश की अर्थव्यवस्था को सुधार देंगे, बेरोजगारी को दूर कर दंगे, प्रष्टाचार को मिटा देंगे आदि ऐसी कोरी कल्पना में लगे रहते हैं। उन्हें अपनी कुर्सी को चिन्ता रहती है जनता या देश की नहीं । देश की स्थिति सुधरे या नहीं अपनी स्थिति जरूर सुधर जानी चाहिए।

प्रश्न 6. कवि ने ‘डफाली’ किसे कहा है और क्यों ?
उत्तर-कवि ने डफालो दास-वृत्ति की चाह रखनेवालों को कहा है। सभी धर्म के लोगों ने नौकरी की खोज में अपना मान सम्मान समर्पित कर दिया है। नौकर बनकर स्वामी की
ठाकुरसुहाती करना ही उनके लिए उत्तम धन है। झूठी प्रशंसा उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गयी है।

प्रश्न 7. व्याख्या करें:-
(क) मनुज भारती, देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान ।
(ख) अंग्रेजी रुचि, गृह, सकल बस्तु देस विपरीत ।
उत्तर-(क) प्रस्तुत पंक्ति प्रेमघनजी द्वारा रचित स्वदेशी कविता से सांकलित है। इसमें कवि ने भारतीयता पर विशेष बल दिया है। भारतीय अपनी संस्कृति को ही भूल गये हैं। उन्हें अपनी पहचान से ईर्ष्या है। अपने लोगों को देखकर भी नजर फेरने की कोशिश करते हैं। हिन्दु, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि सभी विदेशी वस्तुओं को पदावा देने में लगे हुए हैं। वस्तुतः यहाँ कवि में पराधीन भारत को दुर्दशा और भारतीयों की सोच को विशेष रूप से प्रस्तुत किया है।

(ख) प्रस्तुत पंक्ति प्रेमचन’ द्वारा रचित स्वदेशी शीर्षक कविता से संकलित है। कपि, हम अपना रहन-सहन, खान-पान आदि छोड़कर विदेशी वस्तुओं को अपनाने पर बल देते जा रहे । यहाँ पाश्चात्य अलंकरण से अलंकृत भारतीयों की मनोदशा का सजीवात्मक चित्रण किया ।
हमें स्वदेशी वस्तुओं में हीपता नजर आने लगी है। हमें पाश्चात्य संस्कृति अच्छी लगने लगी है।

प्रश्न 8. आपके प्रत से स्वदेशी की भावना किस दोहे में सबसे अधिक प्रभावशाली है? स्पष्ट करें।
उत्तर-मेरे मत से यह दोहा है-
हिन्दुस्तानी, नामसुनि………हाय घिनात।
कवि ने इस दोहे के द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि भारतीय ही अपनी संस्कृति को निम्न समझता है। हिन्दुस्तान या भारतीय का नाम सुनकर ही वे लोग अपने-आप से घृणा करने लगते हैं। पश्चिमी वस्तुओं में वे इतने रम गये हैं कि उन्हें अपना धर्म, पर्व आदि सभी में
होंग नजर आता है।

भाषा की बात
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प्रश्न 1. निम्नांकित शब्दों से विशेषण बनाएँ-
रुचि, देस, नगर, प्रबंध,ख्याल, दासता, झूठ, प्रशंसा ।
उत्तर-रुचि―――रुच
देस――― देसी
नगर―――नागरिक
प्रबंध―――प्रबंधित
ख्याल―――ख्याली
दासता ――–दास
झूठ――― झूठा
प्रशंसा――― प्रशंसित

प्रश्न 2. निम्नांकित शब्दों का लिंग-निर्णय करते हुए वाक्य बनाएँ-
चाल-चलन, खामख्याली, खुशामद, माल, वस्तु, वाहन, रीत, हाट, दासवृत्ति, बानक ।
उत्तर- चाल-चलन ――उसकी चाल-चलन ठीक नहीं है।
खामख्याली―― खामख्याली झूठी होती है।
खुशामद ――खुशामद अच्छी चीज नहीं है।
माल ―–माल छूट गया।
वस्तु――वस्तु अच्छी है।
वाहन――वाहन नया है।
रीत ――उसकी रीत नई है।
हाट――शाम का हाट लग गया।
दासवृत्ति―― उसकी दासवृत्ति अच्छी है।
बानक ――उसका बानक अच्छा है।

प्रश्न 3. कविता से संज्ञा पदों का चुनाव करें और उनके प्रकार भी बताएं।
उत्तर- वस्तु,:-जातिवाचक संज्ञा
भारतीयता:- भाववाचक संज्ञा
भारत :- व्यक्तिवाचक संज्ञा
मनुज :-जातिवाचक संज्ञा
भारतीय :-व्यक्तिवाचक संज्ञा
चाल-चलन :-भाववाचक संज्ञा
देश :-जातिवाचक संज्ञा
विदेश :-जातिवाचक संज्ञा
बसन:- जातिवाचक संज्ञा
गृह :-जातिवाचक संज्ञा
हिन्दुस्तानी :-जातिवाचक संज्ञा
नगर:- जातिवाचक संज्ञा
हाटन:-जातिवाचक संज्ञा
घोती :-जातिवाचक संज्ञा
खुशामद:-भाववाचक संज्ञा
नर:-जातिवाचक संज्ञा

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