class 10th hindi notes – जित-जित मैं निरखत हूँ

जित-जित मैं निरखत हूँ

class 10th hindi notes

class – 10

subject – hindi

lesson 8 – जित-जित मैं निरखत हूँ

जित-जित मैं निरखत हूँ
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-पं० बिरजू महाराज
* लेखक परिचय:-बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी (शुक्रवार) 1938 ई. को सुबह 8 बजे बॅसतपंचमी के दिन लखनऊ के जफरीन अस्पताल में हुआ था। इनके पिताजी 22 साल से रामपुर में रहते आ रहे थे। लखनऊ घराने के बंशज और सातवीं पीढ़ी के कलाकार के रूप में बिरजू महाराज ने कत्थक नृत्य के माध्यम से देश ही नहीं विदेशों में भी धूम मचा दी। इनका संबंध विभिन्न राजघरानों से था। रामपुर, पाटियाला, रायगढ़ आदि घरानों में आना-जाना रहता था। इन्होंने हिन्दुस्तानी डांस म्यूजिक दिल्ली में रहकर तीन साल तक काम किया। इस प्रकार अनेक स्थानों, सभाओं, आयोजनों में बिरजू महाराज ने अपने कत्थक नृत्य द्वारा लाखों लोगों को आकर्षित किया, मन को मोहा।
कलाकार की विशेषताएँ-बिरजू महाराज भारतीय कलाकार थे जिन्होंने अपनी प्रतिभा से कला जगत को काफी लाभान्वित किया। वे एक कत्थक नर्तक थे। उनमें गजब की स्फूर्ति थी।’
पैरों में विद्युत-सी गति देखते बनती थी-जब वे नृत्य करने लगते थे। पूरी जिन्दगी कत्थक नृत्य के लिए उन्होंने समर्पित कर दिया। मिलनसारिता और सद्व्यवहार से सबका दिल जीत लेते थे। घोर अभावों में भी पलकर संघर्ष करते रहे। मेहनत का ही फल कि एक दिन कला की दुनिया
में उन्होंने अपने नाम की शोहरत पैदा कर दी। वे सच्चे कलाकार थे। ईश्वर के प्रति गहरी आस्था थी। उनके भीतर जिन्दा इंसान वास करता था।
* सारांश:-पंडित बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 ई० को लखनऊ के एक अस्पताल में हुआ। वे घर में तीन बहनों के बाद आखिरी संतान। पिता नर्तक थे और इस सिलसिले में विभिन्न रजवाड़ों में जाते थे, इसलिए जहाँ-तहाँ जाना होता था। छ: साल की उम्र में ही नाचने लगे। पिता जो बोल देते, उसे फट से याद कर लेते। पिता से ही गण्डा बँधवाया।
अभी प्रशिक्षण का ही दौर चल रहा था कि पिता की मृत्यु हो गई। काका का घर में। श्राद्ध के पैसे के लिए भी नाचना पड़ा। चौदह साल की उम्र में संगीत भारती गए और फिर भारतीय कला केन्द्र। यहाँ नृत्य सीखनेवालो के आकर्षण का केन्द्र बने। बाद में लच्छू महाराज के सहायक बन गए। कोलकात्ता में नाचे तो बड़ी प्रशंसा हुई उसके बाद श्रीदास स्वामी कांफ्रेंस बम्बई में खूब वाह-वाही मिली। पहली बार विदेश साथ गए। कमार संभव लेकर 27 वर्ष की उम्र में संगीत नाटक अकादेमी का अवार्ड मिला इस बीच विवाह भी हो गया। लोगों ने कहा मुंबई जाओ पर गए नहीं। वे सत्यजीत रे की फिल्म का रिसेन्ट किया। लेकिन सारा ध्यान शिष्यों को सिखाने पर रखा। फलतः रश्मि वाजपेयी वैरोनिक, फिलिप मेक्लीन टॉक और तीरथ प्रताप, प्रदीप आदि ने नाम कमाया।
ख्याति बढ़ती गई। विदेशों की अनेक यात्राएँ की जर्मनी, जापान, हांगकांग, लाओस, वर्मा, अमेरिका….। धीरे-धीरे माली हालत सुधरने लगी। माँ से ठुमरी सीखी। वे गुरुआइन की गलतियाँ बता देंती।

गद्यांश पर आधारित अर्थ ग्रहण-संबंधी प्रश्न
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1. बिरजू महाराजः जन्म मेरा लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे; वसंतपंचमी के एक दिन पहले हुआ। घर में आखिरी सन्तान। तीन बहनों के बाद। सबसे छोटी बहन मुझसे आठ-नौ साल बड़ी। अम्मा तब 28 के लगभग रही होगी। बहनों का जन्म रामपुर में क्योंकि बाबूजी यहाँ 22 साल रहे। बड़ी बहन लगभग 15 साल बड़ी। उस समय बाबूजी रायगढ़ आदि राजाओं के यहाँ भी गए। मैं डेढ दो साल का था। उस समय विभिन्न राजा कुछ समय के लिए कलाकारों को माँग लिया करते थे। पटियाला भी गए थे पहले। रायगढ़
दो ढाई साल रहे होंगे। रामपुर लौटकर आए। रामपुर काफी अरसे रहे। जब पाँच-छह साल के थे तो अकसर नवाब याद कर लिया करते थे। हलकारे आ गए तो जाना ही पड़ता था। चाहे भी वक्त हो।

(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) विष के दाँत
(ख) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ग) मछली
(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ख) बिरजू महाराज
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) भीमराव अंबेदकर

(ग) संदेशवाहक आने के बाद बिरजू महाराज को कहाँ जाना पड़ता था? और क्यों

(घ) बिरजू महाराज का पारिवारिक जीवन कैसा था?
उत्तर-(क)-(ख) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख)-(ख) बिरजू महाराज
(ग) अधिकतर राजा अपने दरबार में नृत्य, संगीत का आयोजन करते रहते थे। कलाकारों को वे कुछ समय के लिए माँग लिया करते थे। बिरजू के पिताजी भी रामपुर दरबार से जुड़े हुए थे। बिरजू के नृत्य से नवाब साहब प्रभावित थे। अक्सर उनको बुलावा आता रहता था। नवाबी
घराने से संबंध रखने के कारण ही उन्हें जाना पड़ता था।
(घ) बिरजू अपने माता-पिता की अंतिम संतान थे। तीन बहनों के बाद उनका आविर्भाव हुआ था। सबसे बड़ी बहन 15 साल और छोटी बहन आठ-नौ साल बड़ी थी।

2. मैं नाचता था जाकर। पीछे पैर मोड़कर बैठना पड़ता था। चूड़ीदार पैजामा, साफा, अचकन पहनकर, अम्मीजी बेचारी बहुत परेशान। उन्होंने हमारी तनख्वाह बाँध दी थी। बाबूजी रोज हनुमानजी का प्रसाद माँगें तब 22 साल गुजर गए, अब नौकरी छूट जाए। नवाब साहब बहुत नाराज कि तुम्हारा लड़का नहीं होगा तो तुम भी नहीं रह सकते। खैर बाबूजी बहुत खुश हुए और उन्होंने मिठाई बाँटी। हनुमानजी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी।

(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) शिक्षा और संस्कृति
(ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) बिरजू महाराज
(ख) मैक्समूलर
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) यतीन्द्र मिश्र

(ग) बाबूजी हनुमानजी से क्या माँगते थे और क्यों?

(घ) प्रस्तुत गद्यांश से बाबूजी के कैसे स्वभाव का पता चलता है?
उत्तर-(क)-(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख)-(क) बिरजू महाराज
(ग) बिरजू महाराज के बाबूजी हनुमानजी से प्रार्थना इस लिए करते थे कि रामपुर के नवाब की नौकरी छूट जाए। उन्हें नौकरी पसंद नहीं थी।
(घ) बिरजू महाराज के पिताजी स्वतंत्र विचार के आदमी थे। उन्हें कला से तो लगाव था किंतु गुलामी उन्हें पसन्द नहीं थी। वे अपने ढंग से जीना चाहते थे।

3. तालीम इसी किस्म की थी। कुछ क्लास में देखा। कुछ ताऊजी को सिखा रहे हैं, उसे देखा। कुछ लखनऊ में। इसके अलावा प्राइवेट प्रोग्राम जिनमें बाबूजी जाते थे जौनपुर, मैनपुरी, कानपुर, देहरादून, कलकत्ता, बंबई आदि, इनमें उसे जरूर रखते थे। पहले इसीलिए कलकत्ते में
बहुत मजा आया। इसमें फर्स्ट प्राइज मिलनेवाला था। उसमें शम्भू महाराज, चाचाजी और बाबूजी दोनों नाचे। पर उसमें फर्स्ट प्राइज मुझे मिला। तो चाचाजी कहने लगे देख भैया बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्लाह। और मैं बहुत खुश। चेन और मेडल वगैरह मुझे मिला। उस समय
मैं आठ-साढ़े आठ साल का था। समझ लीजिए कि नौ-साढ़े नौ साल के भीतर ही सब तमाशे हो गए मेरी जिन्दगी के।

(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नाखून क्यों बढ़ते हैं
(ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) नागरी लिपि
(घ) जित-जित मैं निरखत हूँ

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) विनोद कुमार शुक्ल
(ग) बिरजू महाराज
(घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी

(ग) बिरजू महाराज को कलकत्ते में क्यों मजा आया?

(घ) चाचाजी से किसका बोध होता है? फर्स्ट आने पर उन्होंने बिरजू महाराज के बारे में क्या कहा?
उत्तर-(क)-(घ) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख)-(ग) बिरजू महाराज
(ग) कोलकात्ता में एक आयोजन का जिसमें फर्स्ट आनेवाले को पुरस्कार मिलनेवाला था।
इस आयोजन में बिरजू महाराज के बाबूजी, चाचा शम्भू महाराज और छोटे से बिरजू महाराज भी नाचे। पिता और चाचा के रहते हुए प्रथम पुरस्कार बिरजू महाराज को मिला। इसलिए बिरजू महाराज को बहुत मजा आया।
(घ) चाचाजी से शम्भू महाराज का बोध होता है। बिरजू महाराज के फर्स्ट आने पर उन्होंने अपने बड़े भाई अर्थात् बिरजू महाराज के पिताजी से कहा “बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्लाह।’

4. मेरी एक बड़ी खास आदत रही है, जैसे कि मेरे बाबूजी की भी थी कि जब शार्गिद को सिखा रहे हैं तो पूर्ण रूप से मेहनत कर सिखाना और अच्छा बना देना है। ऐसा बना देना कि मैं खुद हूँ। यह कोशिश है। पर अब भगवान की कृपा भी होनी चाहिए तब। मतलब कोशिश यही रहती है कि मैं कोई चीज चुराता नहीं हूँ कि अपने बेटे के लिए ये रखना है उसको सिखाना

(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) मछली
(ख) आविन्यो
(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(घ) शिक्षा और संस्कृति

(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) बिरजू महाराज
(ख) मैक्समूलर
(ग) महात्मा गाँधी
(घ) अमरकांत

(ग) बिरजू महाराज का यह कथन किस संदर्भ में है?

(घ) बिरजू महाराज अपनी किस आदत के बारे में क्या बताते हैं?
उत्तर-(क)-(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ.
(ख)-(क) बिरजू महाराज
(घ) बिरजू महाराज अपने शिष्यों को शिक्षा देने के संदर्भ में अपनी आदत का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अपने पिता की तरह उनकी खास आदत रही कि शिष्यों को मेहनत करके
(ग) बिरजू महाराज का यह कथन शिष्यों की शिक्षा के संदर्भ में है। सिखाना और उन्हें अच्छा अपने जैसा बनाने की चेष्टा करना वे कहते हैं कि वे बेटों और शिष्या
वह सब कुछ अपने शिष्यों को भी में भेद नहीं करते। वे जो अपने बेटों-बेटियों को सिखाते सिखाते हैं।
5. यहाँ तक कि मेरे बेटे भी ध्यान नहीं देते। उस तरह का ध्यान नहीं देते जैसे कि मेरी
कहानी आपने सुनी है। इन लोगों ने कभी ये नहीं सोचा कि हाँ भैया ने कहा है-हुक्म दे दिया है
तो हम दो साल तक कुछ नहीं सोचेंगे। बस यही सोचेंगे। उस तरह का त्याग नहीं है। उतनी शान
ही नहीं है। नाचते हैं तो उसे भी एक एन्जॉय सोचकर कर लेते हैं।
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
(क) बहादुर
(ख) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ग) विष के दाँत (घ) परम्परा का मूल्यांकन
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं?
(क) गुणाकर मूले
(ख) रामविलास शर्मा
(ग) नलिन निलोचन शर्मा (घ) बिरजू महाराज
(ग) कथनकार को किस बात की पीड़ा है?
(घ) गद्यांश का आशय लिखिए।
उत्तर-(क)-(ख) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख)-(घ) बिरजू महाराज
(ग) वक्ता अर्थात् बिरजू महाराज को इस बात की पीड़ा है कि आज नृत्य सीखनेवाले
सीखने पर पूरा ध्यान नहीं देते। उन्हें अपने बेटो से भी यही शिकायत है कि उनमें भी सीखने का
वह जज्बा नहीं है जो उनमें था। वे नाचते भी हैं तो आनन्द समझकर अर्चना के रूप में नहीं।
(घ) बिरजू महाराज के कहने का आशय यह है कि आज किसी कला को सीखने में
लोगों का ध्यान उतना नहीं है। उनमें समर्पण भावना नहीं है। लोग कला को साधना नहीं मानते,
महज आनन्द का साधन मानते हैं। यही कारण है कि वे संबंधित कला का पर्याय नहीं बन पाते।
6. और प्रोफेशनल जहाँ आता है तो चार जगह बुराई करेंगे कि उन्हें क्या आता है वो तो
ऐसे ही बेकार आदमी है। तो मुझे मालूम है इस चीज का। मुझे कोई द्वेष नहीं है शुरू से किसी के
(क) प्रस्तुत गद्यांश किस पाठ से लिया गया है ?
बारे में। जो करता है बढ़िया करता है बस मैं अपना बुरा नहीं चाहूँगा। वह यही खास आदत है।
(क) शिक्षा और संस्कृति (ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(घ) श्रम विभाजन और जाति प्रथा
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) बिरजू महाराज (ख) मैक्समूलर
(ग) अशोक वाजपेयी
(घ) यतीन्द्र मिश्र
(ग) बिरजू महाराज किसके संबंध में और क्या कहते हैं?
(घ) बिरजू महाराज अपनी किस आदत का जिक्र करते हैं?
उत्तर-(क)-(ग) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख)-(क) बिरजू महाराज
(ग) बिरजू महाराज प्रोफेशनल लोगों के बारे में लोगों के मंतव्य की चर्चा करते
हैं कि जहाँ कहीं कलाकार जाते हैं, वहाँ कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनमें कलाकार भी होते हैं जो
कहते हैं कि उन्हें कुछ नहीं आता, बेकार के आदमी है।
कहते
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(हिन्दी-x(गद्य खंड)
(घ) बिरजू महाराज का कहना है कि वे ऐसा नहीं करते। वे कहते हैं जो करते हैं अच्छा
करते हैं। यह उनकी खास आदत है।
7.बि०म०:- अम्माजी का बहुत बड़ा हाथ है। अम्माजी ने तो शुरू से उन बुजुर्गों की तारीफ
कर करके मेरे सामने हरदम कि, बेटा वो ऐसे थे। उनको कम-से-कम इतना नाम तो याद था
उन बुजुर्गों का। अभी आप दूसरे किसी से पूछे घर में तो उन्हें नाम भी नहीं मालूम था कि कौन
थे। चाची (शंभू महाराज की पत्नी) से आप पूछे महाराज बिन्दादीन के बाद पहले और कौन थे
तो उनको नहीं मालूम। ठुमरियाँ भी मैंने उनसे सीखीं। मेरी वाकई में गुरुवाइन थीं; वो माँ तो थीं
ही। गुरुवाइन भी। और जब भी मैं नाचता था तो सबसे बड़ा एक्जामिनर या जज अम्मा को समझता
था। जब भी वो नाच देखती थीं तो मैं कहता था उनसे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ।
मतलब बाबूजी वाला ढंग है न। कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कहतीं नहीं बेटा नहीं। उन्हीं
की तस्वीर हो। पर बैले वैले यह तो मेरा नया क्रियेशन है। वो हरदम ऐसे ही कहती रहीं और
लखनऊ के जो बुजुर्ग थे उनसे भी गवाही ली मैंने। चेंज तो नहीं लग रहा है। “नहीं बेटा वहीं
ढंग है। और तुम्हारा शरीर वगैरह टोटल ढंग वैसा ही है। बैठने का, उठने का, बात करने का।
मतलब जैसा था उनका।
(क) यह अवतरण किस पाठ से लिया गया है ?
(क) नाखून क्यों बढ़ते हैं (ख) नौबतखाने में इबादत
(ग) नागरी लिपि (घ) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख) इस गद्यांश के लेखक कौन हैं ?
(क) महात्मा गाँधी
(ख) बिरजू महाराज
(ग) भीमराव अंबेदकर (घ) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ग) नृत्य करते समय बिरजू अपना जज किसे मानते थे? और क्यों?
(घ) बिरजू को गवाही लेने के लिए क्या करना पड़ता था?
उत्तर-(क)-(घ) जित-जित मैं निरखत हूँ
(ख)-(ख) बिरजू महाराज
(ग) जज का काम न्याय करना होता है। न्याय के मंच पर बैठा हुआ व्यक्ति अपना-पराया
नहीं देखता है। बिरजूजी की माँ नृत्य करते समय अच्छे-बुरे की ताकीद किया करती थी। अच्छा
होने पर ही वह अच्छा कहती थीं।
(घ) नृत्य अच्छा हुआ या नहीं इसके लिए बिरजू महाराज अपनी माँ को नियुक्त करते
थे। गायन और नृत्य में कहीं अन्तर तो नहीं हुआ इसके लिए माँ से पूर्वजों का उदाहरण लिया
करते थे। इतना ही नहीं लखनऊवासियों से भी हामी भरवाते थे।
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है?
उत्तर-बिरजू महाराज लखनऊ घराने के कथक नर्तक है और रामपुर राज दरबार में इनके
पिताजी और खुद ये नाचते थे।
2. रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमानजी को प्रसाद क्यों चढ़ाया?
उत्तर-बिरजू महाराज के पिता चाहते थे रामपुर नवाब की नौकरी छूट जाए। अतः, जब
नौकरी छूटी तो पिता ने हनुमानजी को प्रसाद चढ़ाया।
3. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला?
उत्तर-अपने पिता और चाचा शंभू महाराज के साथ नाचते हुए बिरजू महाराज
बार प्रथम पुरस्कार मिला।
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(गोधूलि, भाग-2
4. लच्छू महाराज कैसे आदमी थे?
उत्तर-लच्छू महाराज शौकीन आदमी थे और अपटूडेट रहते थे।
5. बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु कब और कैसे हुई?
उत्तर-बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु 54 वर्ष की उम्र में लू लगने से हुई।
6. बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देनी शुरू की?
उत्तर-बिरजू महाराज ने कानपुर में रहते हुए सीताराम बागला नामक लड़के को नृत्य की
शिक्षा देनी शुरू की।
7: कोलकाता के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या
प्रभाव पड़ा?
उत्तर-कोलकात्ता के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के जीवन में बहुत प्रभाव पड़ा।
उन्हें लगा कि वे कुछ है और कुछ कर सकते हैं।
8. बिरजू महाराज कौन-कौन-से वाद्य बजाते थे?
उत्तर-बिरजू महाराज शौकिया सितार, गिटार, बाँसुरी, हारमोनियम के अलावा तबला बजाते
थे।
पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के साथ
प्रश्न 1. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है?
उत्तर-बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी,
शुक्रवार, सुबह 8 बजे बसंतपंचमी के दिन हुआ था। इस प्रकार लखनऊ बिरजू महाराज का जन्म
स्थान है।
बिरजू महाराज की बहनों का जन्म रामपुर में हुआ था-क्योंकि उनके पिताजी इस शहर
में लगभग 22 साल से रहते आ रहे थे। रामपुर में, बिरजू महाराज का एवं पिताजी का, सपिरवार
अरसे से वास था।
लखनऊ और रामपुर दोनों जगहों से बिरजू महाराज का आत्मीय संबंध था।
प्रश्न 2. रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमानजी की प्रसाद क्यों चढ़ाया?
उत्तर-छ साल की उम्र में बिरजूजी को नबाब (रामपुर) साहब बहुत पंसद करते थे।
बिरजूजी दरबार में जाकर नाचते थे। पैर पीछे मोड़कर बैठना पड़ता था। चूड़ीदार पाजामा और
साफा, अचकन पहनकर। इस बात को लेकर अम्माजी बहुत चिंतत रहा करती थी। नवाब साहब
ने बिरजूजी की तनख्वाह भी बाँध दी थी। बाबूजी (बिरजू के) रोज हनुमान मंदिर जाकर प्रसाद
माँगे कि 22 साल गुजर गए, अब नौकरी छूट जाए। नवाब साहब बहुत नाराज हुए कि तुम्हारा
लड़का दरबार में नहीं रहेगा तो तुम भी नहीं रहोगे। इस बात पर पिताजी बहुत खुश हुए और
उन्होंने हनुमानजी को मिठाई चढ़ाकर बाँटी। हनुमानजी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी।
प्रश्न 3. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू, महाराज किस संस्था से जुड़े
और वहाँ किनके संपर्क में आए?
उत्तर-नृत्य की शिक्षा के लिए बिरजूजी पहले पहल हिन्दुस्तान डांस म्यूजिक, दिल्ली जा
निर्मला जोशी का स्कूल था-जुड़े और वहाँ कपिलाजी, लीला कृपालानी आदि के संपर्क में आए।
4. लच्छू महाराज कैसे आदमी थे?
उत्तर-लच्छू महाराज शौकीन आदमी थे और अपटूडेट रहते थे।
5. बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु कब और कैसे हुई?
उत्तर-बिरजू महाराज के पिता की मृत्यु 54 वर्ष की उम्र में लू लगने से हुई।
6. बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देनी शुरू की?
उत्तर-बिरजू महाराज ने कानपुर में रहते हुए सीताराम बागला नामक लड़के को नृत्य की
शिक्षा देनी शुरू की।
7: कोलकाता के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या
प्रभाव पड़ा?
उत्तर-कोलकात्ता के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के जीवन में बहुत प्रभाव पड़ा।
उन्हें लगा कि वे कुछ है और कुछ कर सकते हैं।
8. बिरजू महाराज कौन-कौन-से वाद्य बजाते थे?
उत्तर-बिरजू महाराज शौकिया सितार, गिटार, बाँसुरी, हारमोनियम के अलावा तबला बजाते
थे।

पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर
पाठ के साथ
――――――――――――――
प्रश्न 1. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है?
उत्तर-बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे बसंतपंचमी के दिन हुआ था। इस प्रकार लखनऊ बिरजू महाराज का जन्म स्थान है।
बिरजू महाराज की बहनों का जन्म रामपुर में हुआ था-क्योंकि उनके पिताजी इस शहर में लगभग 22 साल से रहते आ रहे थे। रामपुर में, बिरजू महाराज का एवं पिताजी का, सपिरवार अरसे से वास था।
लखनऊ और रामपुर दोनों जगहों से बिरजू महाराज का आत्मीय संबंध था।

प्रश्न 2. रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमानजी की प्रसाद क्यों चढ़ाया?
उत्तर-छ साल की उम्र में बिरजूजी को नबाब (रामपुर) साहब बहुत पंसद करते थे। बिरजूजी दरबार में जाकर नाचते थे। पैर पीछे मोड़कर बैठना पड़ता था। चूड़ीदार पाजामा और साफा, अचकन पहनकर। इस बात को लेकर अम्माजी बहुत चिंतत रहा करती थी। नवाब साहब ने बिरजूजी की तनख्वाह भी बाँध दी थी। बाबूजी (बिरजू के) रोज हनुमान मंदिर जाकर प्रसाद माँगे कि 22 साल गुजर गए, अब नौकरी छूट जाए। नवाब साहब बहुत नाराज हुए कि तुम्हारा लड़का दरबार में नहीं रहेगा तो तुम भी नहीं रहोगे। इस बात पर पिताजी बहुत खुश हुए और उन्होंने हनुमानजी को मिठाई चढ़ाकर बाँटी। हनुमानजी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी।

प्रश्न 3. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू, महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके संपर्क में आए?
उत्तर-नृत्य की शिक्षा के लिए बिरजूजी पहले पहल हिन्दुस्तान डांस म्यूजिक, दिल्ली जा निर्मला जोशी का स्कूल था-जुड़े और वहाँ कपिलाजी, लीला कृपालानी आदि के संपर्क में आए।

प्रश्न 4.किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला?
उत्तर-शंभू महाराज (चाचाजी) और बाबूजी के साथ बिरजू महाराज कलकत्ते में (तीनों) किये। वहाँ बिरजू महाराज को प्रथम पुरस्कार मिला। उन्हें चेन और मैडल वगैरह मिला।

प्रश्न 5. बिरजू महाराज के गुरु कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर-बिरजू महाराज के गुरु उनके पिताजी थे। उन्हों बिरजू को गण्डा भी बाँधा। जब गण्डा बाँधा गया तो पिताजी ने अम्मा से कहा कि जबतक तुम्हारा लड़का नजराना नहीं देगा, गण्डा नहीं बांधूगा। बिरजूजी को 500 रुपये के दो प्रोग्राम मिले थे। बिरजूजी ने 500 रु. पिताजी को दिया
तब उन्होंने गण्डा बाँधा। उन्होंने कहा कि गुरु-दक्षिणा का एक भी पैसा नहीं दूंगा। यह मेरा बसा है। मैं इसका गुरु हूँ और यह इसने मुझे नजराना दिया है।

प्रश्न 6. बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देनी शुरू की?
उत्तर-कानपुर में जब बिरजूजी रहते थे और हाईस्कूल की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे उसी समय सीताराम बागला नामक एक अमीर लड़के को नृत्य की शिक्षा देनी शुरू की। बिरजू जो उसे नृत्य सिखाते थे और वह बिरजूजी को ट्यूशन पढ़ाता था।

प्रश्न 7.बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुःखद समय कब आया? उससे संबंधित प्रसंग का वर्णन कीजिए।
उत्तर-बिरजू महाराज के जीवन की सबसे दु:खद घटना पिता की मृत्यु थी। पिता की मृत्यु के समय इनके पास बिल्कुल पैसे नहीं थे। घर में उनका दसवाँ कैसे हो, सभी चिंतामग्न थे। दस दिन के अन्दर उस संकट की घड़ी बिरजू महाराज ने दो प्रोग्राम देकर 500/- पाँच सौ रुपये इकट्ठे
किये और दसवाँ, तेरही कार्य संपन्न किया। बाहर के मित्रों को भी घर की दयनीय दशा की जानकारी नहीं थी। इस प्रकार बिरजूजी के जीवन की सबसे दुःखद घटना पिता का मरना, दस दिनों में नाचना, पैसे इकट्ठे करना, उसने दसवाँ, तेरही का इन्तजाम करना। यह बड़ा कष्टदायक प्रसंग है।
कानपुर या देहरादून पैसा कमाने के लिए नाचने गए थे।

प्रश्न 8. शंभू महाराज के साथ बिरजू महाराज के संबंध पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-शंभू महाराज बिरजू महाराज के चाचाजी थे। दोनों में चाचा-भतीजा का संबंध था। नौ, साढ़े नौ साल की उम्र थी बिरजू की। बिरजूजी आमलेट नहीं खाते थे। चाचाजी खाते थे। वे कहते थे अबे दाल का चिल्ला खाएगा। जब अण्डा कहकर पूछे तो नहीं खाता था पर जब मूंग का दाल कहकर पूछते तो मजा लेकर अंडे खाता था। शंभू महाराज शुरू से ही बड़े शौकीन तबियत के आदमी थे।

प्रश्न 9. कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर-कलकत्ते में बिरजूजी अपने चाचा शम्भू महाराज और पिताजी के साथ नृत्य किये थे। उसके बिरजूजी सर्वोत्तम सिद्ध हुए और उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला। चाचा कहने लगे-बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्लाह। बिरजूजी इसपर बहुत खुश हुए। चेन और मैडल बिरजूजी
को मिला। उस समय बिरजू आठ-साढ़े-आठ साल के थे। सारी खुशियाँ नौ-साढे नौ की उम्र में ही बिरजूजी को मिल गयीं।

प्रश्न 10. संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या क्या थी?
उत्तर-चौदह साल की उम्र में लखनऊ वापस आने पर कपिलाजी अचानक लखनऊ आवीं और मुझे अपने साथ संगीत भारती। (हिन्दुस्तानी म्यूजिक डांस अकादमी) लायी। छ: महीने बैठ गए तो बिरजूजी बहुत खुश हुए। उस समय 250 रुपये तनख्वाह बिरजूजों को मिलता था। दरिया-गंज में जैन साहब का एक दुछत्ती मकान था। वहीं बिरजूजी अम्माजी के साथ रहते थे। वह जैनियों का घर था इसीलिए प्याज खाना मना था। मछली तो वे खाते नहीं थे। लेकिन वहाँ जगह भी छोटी-सी थी। एक टेबल फैन लिया गया था। दरियागंज से 509 नबंर की बस पकड़कर बिरन जी कभी रीगल और कभी-ओडेन सिनेमा के पास उतरते थे। वह स्कूल रिवोली के पास था। यदा-कदा बिरजूजी रास्ता भूल जाते थे। खंबे चारों तरफ थे। किसी भी सीढ़ी से वे चढ़कर पहुंचते थे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने एक चिह्न बनाया कि यहाँ से जाओ। यहाँ से जाओ।

प्रश्न 11. बिरजू महाराज कौन-कौन-से वाद्य बजाते थे?
उत्तर-बिरजू महाराज सितार, गिटार और हारमोनियम बजाते थे। बाँसुरी, सरोद और तबला में भी वे प्रवीण थे।
प्रश्न 12. अपने विवाह के बारे में बिरजू महाराज क्या बताते हैं?
उत्तर-बिरजू महाराज ने अपनी शादी के बारे में बताया है कि जब वे 18 वर्ष के थे तभी अम्माजी ने जबरदस्ती उनकी शादी कर दी। यह उनकी बहुत बड़ी गलती थी। क्योंकि बिरजू महाराज उस समय बेरोजगार थे। वे दिन उनके संघर्ष के दिन थे। कहीं पिताजी मर गए तो फिर कौन इसकी शादी करेगा, इसी चिंता में अम्माजी ने शादी कर दी जो बिरजूजी के लिए नुकसान-देह रहा। नाच और रियाज में अविवाहित में जो आंनद, स्वच्छंदता थी वह शादी के बाद नहीं रही।
शादी, गृहस्थी, लखनऊ, घर आदि की चिंता में सदा वे घिरे रहे थे। परिवार के भरण-पोषण के लिए तो नौकरी करना अब लाचारी बन गयी थी। शादी के कारण ही बंबई जाकर चाचीजी के साथ सहायक बनकर फिल्म में काम करने
से बिरजू महाराज वंचित रह गए। कुछ लोगों की सलाह पर इधर-उधर भागने का चक्कर छोड़कर वे इत्मीनान से घर-गृहस्थी के प्रति जिम्मेवार बने और नौकरी करते हुए नृत्य और रियाज के बल पर उच्च शिखर तक पहुँच पाए।

प्रश्न 13. बिरजू महाराज की अपने शागिर्दो के बारे में क्या राय है?
उत्तर-बिरजू महाराज के शागिर्दो में शाश्वती, वैदोनिक (विदेशी), फिलिप, मेक्लीन टॉक आदि थे। तीरथ प्रताप और प्रदीप ये लोग भी थे जो अपने क्षेत्र में नाम किये। इन लोगों को बहुत जल्दी तसल्ली इस बात की हुई कि वे लोग कमाने तो लगे हैं।
कला के लिए सच्चे दिल से परेशान होनेवाले बहुत कम लोग होते हैं जो कि उसे आगे बढ़ाएँ।
लड़कियों शाश्वती खूब तरक्की करनेवाली है। दुर्गा जो गरीब घर से आती है फिर भी उसका मन नृत्य से अधिक जुड़ा हुआ है। कृष्णमोहन और राममोहन को उतना ध्यान नहीं है।
यहाँ तक की लेखक का बेटा भी गैरजिम्मेवार है।
इस प्रकार उपर्युक्त कालकार बिरजू महाराज के शागिर्दो में आते हैं जिनकी कला की वृद्धि से सारा कला जगत लाभान्वित है।

प्रश्न 14. व्याख्या करें-
(क) पाँच सौ रुपये देकर मैंने गण्डा बँधवाया।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘जित-जित में निरखत हूँ’ पाठ से ली गयी है। इन पंक्तियों का संबंध लेखक और बिरजू महाराज से है।
बिरजू महाराज की शिक्षा उनके पिताजी से ही मिली थी। वे ही उनके आरंभिक गुरु गुरु-दक्षिणा में पिताजी ने अम्मा से कहा कि जबतक तुम्हारा लड़का नजराना यानी गुरु दक्षिण नहीं देगा तबतक मैं उसे गण्डा नहीं बाँधूंगा। बिरजूजी को 500/- पाँच सौ रुपये के दो प्रोग्राम मिले थे। जब बिरजूजी ने 500 रुपये पिताजी को दिया, तभी पिताजी ने गंडा बाँधी। उन्होंने कहा था कि यह दक्षिणा मेरा है अतः, इसमें से एक भी पैसा नहीं दूंगा। मैं इसका गुरु हूँ और इसने नजराना मुझे दिया है तब 500 रुपये देकर बिरजूजी ने अपने पिता से गंडा बँधवाया।
इन पंक्तियों से आशय यह झलकता है कि गुरु-शिष्य की पंरपरा बड़ी पवित्र परंपरा है। इसकी मर्यादा रखनी चाहिए। तभी तो पिता-पुत्र का संबंध रहते हुए बिरजू महाराज के पिताजी- जी ने गुरु-शिष्य का संबंध रखा, पिता-पुत्र का नहीं। गुरु-दक्षिणा में 500/- रुपये लेकर ही गंडा बाँधा। इस प्रकार गुरु की महिमा बड़ी है। मर्यादायुक्त है। उसकी रक्षा होनी चाहिए। मैं कोई चीज चुराता नहीं हूँ कि अपने बेटे के लिए ये रखना है, उसको सिखाना है।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक से ‘जित जित मैं निरखत हूँ’ पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का संबंध बिरजू महाराज के गुरु-शिष्य संबंध से है। जब बिरजूजी किसी को
नृत्य सिखाते थे तो कोई भी कला चुराते नहीं थे। यानी लड़का-लड़की का भेदभाव नहीं रखते थे। समान व्यवहार और समान शिक्षा देते थे। यह नहीं कि किसी को किसी भाव वश कुछ सिखाया और कुछ चुरा लिया।
उनकी शिष्यों के प्रति उदार भावना थी और भीतर मन में किसी भी प्रकार की कलुषित भावना नहीं थी।
उनमें यह भेद नहीं था कि बेटे के लिए अच्छी चीजों को चुराकर रखना है, दूसरों का आधी-अधूरी शिक्षा देनी है।
इन पंक्तियों में बिरजूजी के मनोभावों का पता चलता है। उनमें पुत्र-शिष्य या लड़का-लड़की का भेदभाव नहीं था। विचार में पवित्रता और गुरु की सदाश्यता थी।
(ग) मैं तो बेचारा उसका असिस्टेंट हूँ उस नाचनेवाले का।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के जित-जित मैं निरखत हूँ। पाठ से ली गयी हैं। इन पंक्तियों का संबंध लेखक के नृत्य और उनके व्यक्तिगत जीवन से है। बिरजूजी का कहना है कि मेरी नाच पर बहुत लोग खुश हो जाते हैं, देखने आते हैं, ये मेरे चाहनेवाले हैं, मेरा आशिक हैं। लेकिन फिर बिरजू महाराज स्वयं को प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि मेरा क्या? लोग तो मेरे नृत्य की वजह से मेरी तारीफ करते हैं, मुझे चाहते हैं। मेरे और लोगों के बीच जो प्रेम-संबंध
है-वह तो नाच के कारण है। उसमें मैं कहाँ। वहाँ तो कला है, नाच है। मैं तो उस नाच का असिस्टेंट हूँ। सहायक हूँ।
इन पंक्तियों में बिरजूजी ने अपने को और नाच के बीच लोगों के प्यार, स्नेह, सम्मान की चर्चा करते हुए कहते हैं कि सम्मान मेरा नहीं मेरे नाच को है। मैं तो उसका सहायक हूँ। इस प्रकार कला या गुण सर्वोपरि है। आदमी कुछ नहीं है। उसकी गुणवत्ता की पूजा होती है, सम्मान मिलता

प्रश्न 15. बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज किसको मानते थे?
उत्तर-बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज अपनी अम्मा को मानते थे। जब भी वे नाच देखती थीं तो बिरजूजी पूछते थे कि गलत तो नहीं कर रहा हूँ। उनका मतलब था पूछना का कि बाबूजी वाला ढंग है ना कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। माँ कहती थी कि नहीं, बेटा। उन्हीं की तुम तस्वीर हो। बैठने, उठने, बोलने, नृत्य करने का सारा कुछ पिता का ही है। इस प्रकार बिरजूजी की माँ बराबर जज के रूप में निर्णय देकर बेटे को प्रोत्साहित करती थीं।

16. पुरान और आज के नर्तकों के बीच बिरजू महाराज क्या फर्क पाते है?
उत्तर-पुराने और नए नर्तकों में काफी अंतर बिरजू महाराज देखते हैं। जहाँ पुराने नर्तक शांत, गंभीर और शीलवान हुआ करते थे वहाँ आज के नर्तक सारी सुविधाओं की चर्चा करने
लगते हैं। नए डांसर कहते हैं कि स्टेज खराब है, टेढ़ा है, तो यह गडढा है। गर्मी में एयर कंडीश्नर पड़ता था। नाचने में कहीं उससे टकराहट न हो जाए, इसका भी ख्याल रखना पड़ता था। दूसरे खोजते हैं। बड़े-बड़े पंखों से पुराने जमाने में नौकर हाँकते रहते थे उनसे भी हाथ बचाकर नाचना
तरफ जल रही लाइट की गर्मी भी सहनी पड़ती थी। इस प्रकार नए-पुराने के बीच विचार, व्यवहार और आत्मसंयम के बीच बिरजूजी अंतर पाते हैं।

भाषा की बात
―――――――––―
प्रश्न 1. काल रचना स्पष्ट करें-
उत्तर-(क) ये शायद 43 की बात रही होगी-भूतकाल
(ख) यह हाल अभी भी है- वर्तमान काल
(ग) उस उम्र में न जाने क्या नाचा रहा होऊँगा-भविष्यत् काल
(घ) अब पचास रुपये में रिक्शे पर खर्च करता तो क्या बचता, और ट्यूशन में हो तो पैसा अलग काट लेते थे।-भूतकाल
(ङ) पचास रुपये में काम करके किसी तरह पढ़ाता रहा
भूतकाल

प्रश्न 2. अर्थ की रक्षा करते हुए वाक्य की बनावट बदलें:
(क) चौदह साल की उम्र में, जब मैं वापस लखनऊ आया फेल होकर, तब कपिला जी अचानक लखनऊ पहुँची मालूम करने के लिए कि लड़का जो है वह कुछ करता भी
है या आवारा या गिरहकट हो गया, वह है कहाँ?
उत्तर-चौदह साल की उम्र में फेल होकर जब लखनऊ वापस आया तब अचानक कपिलाजी यह मालूम करने के लिए लखनऊ पहुँची कि वह लड़का कहाँ रहता है और कुछ करता भी है या आवारा गिरहकट हो गया है।
(ख) वह तीन साल मैंने खूब रियाज किया, मतलब यही सोचकर कि यही टाइम है अगर कुछ बढ़ना है तो अंधेरा कमरा करके किया करता था जब बाद में थक जाऊँ मैं
तो जो भी साज हाथ आए कभी सितार, कभी गिटार, कभी हारमोनियम लेकर बजाऊँ मतलब रिलैक्स होने के लिए।
उत्तर-अंधेरे कमरे में वक्त के बारे में सोचकर तीन साल तक मैंने खुब रियाज किया पर कभी सितार, कभी हारमोनियम, कभी गिटार रिलैक्स होने के लिए बजाया करता था।

प्रश्न 3. पाठ से ऐसे दस वाक्यो का चयन कीजिए जिससे यह साबित होता हो कि ये वाक्य आमने-सामने बैठे व्यक्तियों के बीच बातचीत के हैं, लिखित भाषा के नहीं।
उत्तर-स्वयं लिखें।

प्रश्न 4. निम्नलिखित वाक्यों से अव्यय का चुनाव करें-
(क) जब अंडा कहकर पूछे तो नहीं खाता था पर जब मूंग की दाल कहें तो बड़े मजे से खा लेता था।
उत्तर-अव्यय-जब, तो, पर, जब
(ख) एक सीताराम बागला करके लड़का था अमीर घर का।
उत्तर–अव्यय-का एक
(ग) बिल्कुल पैसा नहीं था कि उनका दसवाँ किया जा सके।
उत्तर-अव्यय-बिल्कुल
(घ) फिर जब एक साल हो गया तो कहने लगे कि अब तुम परमानेंट हो गए।
अव्यय-फिर, जब, एक, तो, अब।

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